हाल के वर्षों में, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन की तेज़ गति ने ‘सतत विकास’ को केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक आवश्यक रणनीति बना दिया है। विशेष रूप से ‘लैंडस्केप आर्किटेक्चर’ या ‘조경’ (조경분야) में, यह प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ रही है। जहां एक ओर भवन और बुनियादी ढांचे को टिकाऊ बनाने की दिशा में प्रयास हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हरित स्थानों की डिज़ाइनिंग भी उसी तरह का महत्व प्राप्त कर रही है।
आजकल की परियोजनाएं कार्बन फुटप्रिंट को कम करने, जल पुनर्चक्रण की सुविधा बढ़ाने और जैव विविधता को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से की जा रही हैं। उदाहरण के तौर पर, बायोस्वेल्स, ग्रीन रूफ, और वर्षा जल संचयन प्रणालियों को शामिल करना आम हो गया है। इस लेख में हम कुछ ऐसे प्रेरणादायक और लाभकारी 조경분야 사례 देखेंगे जो केवल पर्यावरण के लिए अच्छे नहीं, बल्कि निवेश और कमाई की दृष्टि से भी प्रभावी हैं।
टिकाऊ 조경 डिज़ाइन का उदय
सतत 조경 डिज़ाइन की अवधारणा अब केवल सरकारी नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी डेवलपर्स, स्कूल, अस्पताल, और यहां तक कि आवासीय क्षेत्र भी इसमें रुचि ले रहे हैं। इसका मुख्य कारण है, दीर्घकालिक लागत में कमी और ऊर्जा बचत की संभावना। उदाहरण के लिए, भारत के हैदराबाद शहर में एक आईटी पार्क में ग्रीन रूफ और सोलर-शेडेड वॉकवे ने 35% तक एनर्जी खपत कम की।
ऐसे डिज़ाइन केवल पर्यावरण को फायदा नहीं पहुंचाते बल्कि भवनों की स्थायित्व और एस्थेटिक्स को भी बेहतर बनाते हैं। टिकाऊ 조경 की सहायता से स्थानीय पौधों का उपयोग बढ़ता है, जिससे सिंचाई की आवश्यकता घटती है और जैव विविधता भी बनी रहती है।
जल-संरक्षण में 조경 का योगदान
जल एक सीमित संसाधन है और 조경분야 में इसका उचित प्रबंधन एक प्रमुख चिंता रही है। स्मार्ट इरिगेशन सिस्टम, ड्रिप इरिगेशन और वर्षा जल संचयन अब हर आधुनिक परियोजना का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
बेंगलुरु के एक आवासीय परियोजना में, वर्षा जल को संग्रहित कर 80% तक जल उपयोग कम किया गया। यह तकनीक अब शहरी क्षेत्रों में मानक बन रही है। इसके अलावा, वॉटर-फ्रेंडली पौधों के चयन से देखरेख की लागत और जल की आवश्यकता में काफी कमी आती है।
जैव विविधता की रक्षा और बढ़ावा
조경प्रणालियों में जैव विविधता को समाहित करने के अनेक लाभ हैं। यह न केवल प्राकृतिक संतुलन बनाए रखता है बल्कि कीट नियंत्रण, प्राकृतिक परागण और तापमान विनियमन में भी सहायक होता है।
नई दिल्ली की एक ग्रीन बेल्ट परियोजना में स्थानीय पक्षियों और तितलियों के आवास को प्राथमिकता दी गई। इसके लिए विशेष फूलों और झाड़ियों का चयन किया गया जो विशेष प्रजातियों को आकर्षित करते हैं। परिणामस्वरूप, उस क्षेत्र में पक्षियों की विविधता 40% तक बढ़ गई।
सामाजिक सहभागिता और स्वास्थ्य में योगदान
हरी जगहें लोगों की मानसिक और शारीरिक सेहत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अध्ययनों से पता चला है कि ऐसे स्थानों में समय बिताने से तनाव का स्तर कम होता है, और सामाजिक सहभागिता बढ़ती है।
चेन्नई के एक समुदाय पार्क ने ‘walk-and-talk’ ट्रेल्स, योग क्षेत्र और बच्चों के लिए प्ले ज़ोन बनाकर स्थानीय निवासियों के लिए एक सकारात्मक और संवादपूर्ण वातावरण तैयार किया। इससे न केवल समुदाय में स्वस्थ आदतें विकसित हुईं, बल्कि पार्क के आसपास की रियल एस्टेट वैल्यू भी बढ़ी।
कार्बन न्यूट्रल डिज़ाइन की ओर कदम
अब लैंडस्केप डिजाइनरों का फोकस कार्बन न्यूट्रल या यहां तक कि कार्बन निगेटिव डिज़ाइन पर है। इसके लिए कंक्रीट की जगह पोरस मैटीरियल, अधिक वृक्षारोपण और सोलर लाइटिंग का इस्तेमाल बढ़ रहा है।
पुणे की एक यूनिवर्सिटी कैंपस परियोजना में, रीसायकल किए गए मटेरियल से बनी पाथवेज और हर एक वर्गमीटर में एक पौधे की नीति ने कार्बन उत्सर्जन में 25% की कमी लाई। साथ ही, यह छात्र समुदाय को पर्यावरणीय जिम्मेदारी के प्रति जागरूक करने का भी माध्यम बना।
भविष्य की ओर – स्मार्ट 조경 तकनीकों का प्रयोग
स्मार्ट सेंसर, एआई आधारित निगरानी सिस्टम और GIS टूल्स अब 조경분야 में क्रांति ला रहे हैं। ये न केवल निगरानी आसान बनाते हैं बल्कि डेटा के आधार पर पौधों की जरूरतें समझने में भी मदद करते हैं।
हैदराबाद की एक स्मार्ट सिटी परियोजना में, IoT आधारित इरिगेशन सिस्टम लगाया गया है जो मौसम और मिट्टी की नमी के अनुसार पानी देता है। इससे जल की बचत और पौधों की सेहत दोनों बेहतर बनी रहती है।
निष्कर्ष
조경분야 में सतत विकास केवल एक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक सुनहरा अवसर भी है। चाहे निवेश की दृष्टि से देखें या पर्यावरण की, यह क्षेत्र हर दृष्टिकोण से लाभकारी है। आज की तकनीक और सजगता ने हमें ऐसे विकल्प दिए हैं जिससे हम अपने शहरों को हरित, स्वच्छ और सुंदर बना सकते हैं, साथ ही आर्थिक रूप से भी सशक्त कर सकते हैं
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